राजधानी की फैमिली कोर्ट जहां हर दिन टूटते रिश्तों की गूंज सुनाई देती है ।
बीते एक दशक में पति-पत्नी के बीच विवाद तेज़ी से बढ़े हैं और इसकी सबसे बड़ी कीमत मासूम बच्चे चुका रहे हैं । पारिवारिक न्यायालय बार एसोसिएशन जयपुर के पदाधिकारी ने बताया कि वर्ष 2020 में जहां कस्टडी केस 600 थे वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 1200 हो गई है । मतलब सिर्फ 5 साल में दोगुनी संख्या। सामान्य नोक-झोंक, जो कभी परिवारों में बातचीत से सुलझ जाया करती थी। अब अलगाव और कोर्ट-कचहरी की वजह बनती जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट भी मानता है कि मामूली विवादों के कारण अलग होना बच्चों के हित में नहीं है। पदाधिकारी बतातें हैं कि अदालत हमेशा बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देती है । धारा 26 के तहत शिक्षा और भरण-पोषण को लेकर अंतरिम आदेश दिए जाते हैं। लेकिन बेहतर यही है कि माता-पिता आपसी बातचीत से समाधान निकालें। ताकि बच्चों का भविष्य प्रभावित न हो । जयपुर फैमिली कोर्ट में जिस तरह से कस्टडी और भरण-पोषण के मामलों की संख्या बढ़ी है । उसको देखते हुए लगता है कि अगर पति-पत्नी अपने अहंकार से ऊपर उठकर संवाद करें तो कई परिवार टूटने से और कई बच्चों को अदालत की चौखट पर आने से बचाया जा सकता है ।
